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Showing posts from 2015

मै कौन हूँ ?

                                                                            मै कौन हूँ ??? बचपन की आनाकानी में, या हो बेबस जवानी में। लुटती हर वक्त है वो, कश्मीर चाहे कन्याकुमारी में। यूँ तो वह माँ होती हैं, या होती है बहन किसी की, निकलती है जब दुनिया देखने, बन जाती हैं हवस किसी की। पुरुष प्रधान इस देश की, बस इतनी यहीं कहानी हैं, लालन के लिये माँ  राखी के लिये बहन हमसफर के लिये पत्नी लेकिन बेटी के लिये मनाही हैं । लज्जित होना उत्पीडित होना हर दिन की उसकी दिनचर्या है, आवाज उठाओ तो बोलते हैं , तमीज से बात कर,तु मेरी भार्या है। भ्रूण हत्या से शुरूआत होती है अगर बच गयी तो जवानी मे दरिन्दो से रात चार होती है। जवानी की दहलीज पर भी बच गई तो ससुराल मे दहेज के लिये बवाल होता है और अगर वहाँ भी बवाल न हुआ तो बुढ़ापे मे अपने ही बच्चो से फिर सवाल होता है , कि सच मे मै एक महिला हूँ ।

यह पाश की कविता हैं

सपने   हर किसी को नहीं आते बेजान बारूद के कणों में सोई आग के सपने नहीं आते बदी के लिए उठी हुई हथेली को पसीने नहीं आते शेल्फ़ों में पड़े इतिहास के ग्रंथो को सपने नहीं आते सपनों के लिए लाज़मी है झेलनेवाले दिलों का होना नींद की नज़र होनी लाज़मी है सपने इसलिए हर किसी को नहीं आते

अंधेरे से उजाले की ओर

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नही जानता हूँ मै कि यह क्या है और क्यूँ हो रहा हैं? अक्सर दुरिया बनानी चाही है उससे लेकिन किसी लोहे की भाँति मै हमेशा उस चुम्बक की ओर आकर्षित हो जाता हूँ ।जानता हूँ यह छलावा है एक शीश महल जैसा जिसमे हर ओर शीशे लगे है,जिधर भी निगाह फेरो वही नजर आता है लेकिन ऐसा क्यूँ हो रहा है?क्या रिश्ता है उससे?कौन है वह जो मेरे अंतर्मन मे लगातार प्रहार किये जा है? कभी-कभी खुद से जानने की कोशिश मे राते बीत जाती है लेकिन क्यूँ नही ढूँढ पा रहा हूँ मै उस वजह को जो बार बार मेरे मानसपटल पर प्रहार किये जा रही हैं। एक बार हो तो सहसा संभल भी जाऊँ लेकिन यह तो दैनिकता मे विद्दमान हो चुकी है कैसे इससे निजात पाऊँ? सोचता हूँ कोई न कोई वजह जरूर होंगी लेकिन वह भी नजर नही आ रही कहीं गुम हो चुकी है शायद वह वजह भी या फिर कहीं धूमिल पडी है लेकिन मै उसे खोजने मे असमर्थ हो रहा हूँ । आदत सी बन चुकी है किसी सिगरेट की तरह ,हरदम होठो से ही लगाये रखना चाहता हूँ ?लेकिन क्यूँ ? क्यूँ मै उसका इतना आदी बना जा रहाँ हूँ ,जानता हूँ कि अगर आग मे हाथ डालूँगा तो हाथ मेरा ही जलना हैं। हरदम रेल की लाइनों की यादे जेहन में स्फ

‎बेखबर‬

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आहट सुनों  सुनो! आहट तो सुनो जरा, कोई दस्तक दे रहा है मेरे!!! मेरे इस सुने घर में कोई खलल डाल रहा है मेरी आंतरिकता मे स्थित मेरे मस्तिष्क की गहराईयों में ! ! ! जरा गौर से सुनो!!! किसी की दबिश सुनाई दे रही हैं तुम्हें ! अपने हृदय के नयन पटलो को खोलो और अपने चक्षु को केन्द्रित करो तुम देखोगी किसी की दस्तक को महसुस करोगें उस आहट को जो जो मुझे तुमसे दुर किये जाने के लिये आयी थी। ‪ बेखबर‬

डिजिटल इंडिया में नया क्या है?

डिजिटल इंडिया में नया क्या है?इसकी शुरुआत तो हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने १९८० के दशक में NIS [नेशनल इंफोर्मेटिक्स  सेंटर ] से शुरू कर दी थी तो उसे ही आगे बढ़ाया जा रहा है बस। डिजिटल इंडिया का मूल उद्देश्य तकनीक के माध्यम से लोगो का जीवन सरल करना है और इसका एक पहलु यह है की इसके अंतर्गत ढाई लाख पंचायतो को ब्राडबैंड से जोड़ना है लेकिन क्या यह पहल जमीनी स्तर से शुरू नही होनी चाहिये?? पहले ग्राम पंचायतो को इसके लिए परिपक्व करना होगा। अगर आकड़ो पर नज़र डाले  तो हम पायेगे की ३७ फीसदी लोग अब भी हमारे देश में अशिक्षित है ,और ९० करोड़ लोग अब भी इंटरनेट से दूर है। हमारे देश में ९० करोड़ लोगो के पास फ़ोन है लेकिन सिर्फ १४ करोड़ लोग ही ऐसे है जिनके पास स्मार्ट फोन है। गाँवो की तो छोड़िये शहरों में लोग अब भी कॉल ड्राप और कनेक्टिविटी जैसी समस्याओं से लगातार जूझ रहे है। इंटरनेट की गति के मामले में हमारे देश का स्थान दुनिया में ११५ वा है। तो क्या पहले यह नही चाहिए की हम हमारी इंटरनेट की गति उसकी कनेक्टविटी को सुधारे उसके बाद आगे की प्रक्रिया पर अपना ध्यान लगाये।   

कोई हमसे भी तो बोलो यारों

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कोई हमसे भी तो बोलो यारों राज़ दिलो के खोलो यारो क्यूँ सहमे सहमे बैठे हो क्यूँ उखड़े उखड़े रहते हो छोडो सब अनजानी बातें पल ज़िन्दगी का जी लो यारो कोई हमसे भी तो.……। नये लगते हो तुम यहाँ पर नये हम भी है यहाँ पर थोड़ा डर बना रहने दो थोड़ी हँसी निकलने दो तोड़ दो कुछ हदों को कुछ हदों को पी लो यारों कोई हमसे भी तो ………। राज़ दिलों के ………  पंकज

प्रेम में आत्महत्या

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प्रेम करने का यह कैसा तरीका है?यह कैसा प्रेम है,यह कैसी नियति है कि ज्यों ज्यों हमारा प्यार प्रगाढ़ होता जाता है, हमारी माँगे बढ़ने लग जाती है।धीरे धीरे प्रेम अधिकार माँगने लग जाता हैं । जब तक दोस्ती रहती है तब तक तो सब कुछ ठीक चलते रहता है लेकिन जब दोस्ती कुछ आगे बढती है तो वह प्रेम का रूप अख्तियार कर लेती है,और उसके बाद अधिकारों का। अपने साथी से प्रेम पाना भी हम अपना अधिकार समझने लगते है, शायद यहीं कारण हैं कि प्रेमी प्रेम मे डूबने की अपेक्षा अधिकारों की लड़ाई मे खो जाता हैं । आज का यूवा वर्ग इसी प्रेम नामक कब्ज से ग्रसित हैं ।जिस समय उसे अपने भविष्य की चिंता करना चाहिए उस समय वह इस कब्ज के शिकंजे मे आ जाता है।और फिर वह ,वह सब कुछ कर बैठता है जो उसे नहीं करना चाहिए । इसी प्रेम के मायाजाल में फसकर वह तनाव से ग्रसित होता है और मादक पदार्थों को अपना हमदर्द बना लेता है। कभी कभी वह इतना चिंतित हो जाता है कि आत्महत्या जैसा घिनौना कदम भी उठा लेता है। आये दिनो हर रोज अखबारों और टेलीविजन पर खबर चलतें रहती हैं कि आज उस प्रेमी युगल ने आत्महत्या कि, कल उस युवा ने प्रेमिक तनाव

जंगल में मोर नाचा तो किसने देखा ?

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विदेश नीति के रंग डिजिटल इंडिया ,मेक इन इंडिया,स्किल इंडिया में हम इतने सराबोर हो चुके है कि हमारे आंतरिकता में  स्थित देश की पहचान जो गाँवो से है , किसानो से है ,खेतो से है ,जंगलो से है ,मज़दूरों से है उसे लगभग भूल चुके है। यह पहल सही है की विदेश नीति का उद्देश्य  गाँवो को डिजिटल करना है ,लेकिन क्या पहले यह जरुरी नही है की हम गाँवो को डिजिटलाइजेशन के लिए परिपक्व करे?आज भी भारत के गाँव में मौजूद किसान अपना खून पसीना एक कर मेहनत से खेती करता है ,लेकिन उस वक़्त उसकी आस  उसकी उम्मीद टूटती सी नज़र आती है जब सुखा पड़ जाता है या वर्षा अधिक हो जाने से उसकी फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी होती है ,और तब जब वो अपनी बर्बाद फसल के लिए सरकार से मुआवजे की गुहार लगाता है तो  उसे सरकार से सिर्फ  आश्वासन  या ऊठ के मुंह में जीरा के अलावा कुछ भी हांसिल नहीं होता और तब वह न चाहते हुए भी आत्महत्या जैसा घिनौना कदम उठाता है. आज हम गांवो के डिजिटलीकरण की बात कर रहे है लेकिन कर्णधारों से मैं पूछना चाहूंगा की पहले गाँवो में घूम कर देखे तो  आपको पता चलेगा कि आप विदेशों में डिजिटलीकरण की बात तो  कर रहे है लेकिन जिन ग

१०वाॅ विश्व हिन्दी सम्मेलन पूरी तरह साहित्य और साहित्यकारों से नदारद रहा

इस सम्मेलन मे प्रशासन ने गिने हुये सिर्फ कुछ साहित्यकारों को आमंत्रित किया था जो राजनीति से जुड़े हुये थे,उनके अलावा किसी भी साहित्यकार को सम्मेलन मे उपस्थित होने का न्योता नही दिया गया,क्या यह सही है? एक प्रश्न जो हर साहित्य प्रेमी के मन मे कौंध रहा है कि क्या साहित्यकारों का भाषा को बनाने और उसके विकास मे कोई योगदान नही है? हिन्दी भाषा को ऊचाईयो तक ले जाने वाली देश की कई अग्रिम संस्थाओ को भी इस सम्मेलन मे सिरे से खारिज कर दिया गया । साहित्य अकादमी,भारतीय ज्ञानपीठ अकादमी जिनसे हर बार विश्व हिन्दी सम्मेलन मे शामिल होने वाले लोगों की सूची मागी जाती थी इस बार उन्हें पूर्णतः हाशिए पर रखा गया। क्या यह साहित्य की तौहीन नही है? जिन लोगों ने अपनी लेखनी से भाषा को समृद्ध और परिपक्व बनाने मे अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया हो क्या उन्हें निमंत्रण नही दिया जाना चाहिए था? बात तो तब और बिगड़ जाती है जब हमारे देश के विदेश राज्यमंत्री साहित्यकारो की तौहीन मे एक ओछा बयान देते है कि लेखक आते है,खाते है पीते है और पेपर पढ़ कर चले जाते है क्या यह गलत नहीं है? किसी ने भी इस सम्मेलन मे

विश्व हिंदी सम्मेलन

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आगामी 10-12 सितम्बर तक विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन भोपाल मे होना है,और इसका बिगुल भी सारे देश मे बजना शुरू हो चुका हैं ।तमाम राजनेता और नागरिकों के जुबान पर हिन्दी अब छाने लगी है,बिलकुल वैसे ही जैसे कोई त्योहार होने पर घर मे चार दिन पहले से रौनक छाने लग जाती है।अब हर कोई अपना वक्तव्य देने लगा है कि हमे हिन्दी मे यह करना चाहिए वह करना चाहिए , हिन्दी हमारी राजभाषा है हिन्दी हमारी मातृभाषा है और भी न जाने क्या क्या ? अब हर सोशल नेटवर्किंग साइट पर इसकी धूम देखने को मिल जाएंगी कि आप अपना कोई भी काम हिन्दी मे कीजिए , सोशल साइट्स का उपयोग हिन्दी मे कीजिए, और भी तमाम तरह की अटकले हिन्दी के बारे मे लोग देते मिलेंगे ।लेकिन कब तक , जब तक यह चर्चा मे हैं क्योंकि हमारे देश का उसुल है कि कोई भी मुद्दा तब तक सुर्खियों मे हैं जब तक की उस पर आरोप प्रत्यारोप और राजनीति चालू है। उसके बाद वह फाइल बंद हो जाएंगी । तो जैसा की हमे ज्ञात है पूरे 32 साल बाद भारत मे होने जा रहे इस ऐतिहासिक सम्मेलन मे विश्व के 27 देशो के हिंदी के प्रखर वक्ता और विद्वान सिरकत करने वाले है साथ ही सा

बेहाल मध्यप्रदेश

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नजर नवाज,नजारा ,कुछ बदला हुआ सा हैं । प्रदेश का लोकतंत्र मेरा,आज कुछ सहमा हुआ सा हैं । न शिद्दत बची है कुछ पाने की, न हिम्मत बची है कुछ कर दिखाने की, उठता हुआ मध्यप्रदेश मेरा,आज कुछ सोया हुआ सा हैं । व्यापम की मार से, गुनहगाँरो की हाहाँकार से, आम आदमी की हार से, जालिम सरकार से, देख भोज!तेरा भोपाल आज कुछ खोया हुआ सा हैं । सियासत की खुमारी हैं , पड़ रही अब सब पर भारी हैं , कैसी गहमा-गहमी है ये, जंग अभी तक जारी हैं , देश का प्रधान भी मेरा,आज कुछ "मनमोहन "हुआ सा हैं । चार पेज की फाईल बनी हैं , रिश्वत ही शायद साहिल बनी है, क्या अब कुछ हल निकलेगा ? शायद आज नहीं तो कल निकलेगा , इसी काल्पनिक मार से ,जन जन आज कुछ रोया हुआ सा हैं । नजर नवाज,नजारा ,कुछ बदला हुआ सा हैं । प्रदेश का लोकतंत्र मेरा आज कुछ सहमा हुआ सा हैं । " 

अंधविश्वास

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इस सूचना क्रांति और आधुनिकता के दौर मे हम भले ही अंतरिक्ष और चांद पर घर बसाने कि सोच रहे है।हमारा वैज्ञानिक समाज जो आये दिन नये -नये आविष्कार कर रहा है, हर दिन नीत नये कीर्तिमान स्थापित कर रहा है, लेकिन हमारे समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा आज भी ऐसा है जो अंधविश्वास और झूठी परम्पराओ के जाल मे फँसा हुआ है।और ताज्जुब की बात यह है कि इन अंधविश्वासी परम्पराओ के भवर मे बहुत बड़ा शिक्षित समाज भी है। इस शिक्षित समाज मे भी हम बहुत सी परम्पराओ और अंधविश्वासो को बिना कुछ विचार किये ज्यों का त्यों स्वीकार किये जा रहे है ,हम यह भी नही देख रहे कि इन परम्पराओ का ,इन अंधविश्वासो का कोई आधार कोई अस्तित्व है भी या नहीं । हमारी बहुत सी मान्यताए ऐसी है जो विज्ञान और आधुनिक ज्ञान की कसौटी पर खरी नहीं उतरती है ।वैज्ञानिक युग के बढ़ते प्रभाव के बावजूद अंधविश्वास की जडे समाज से नहीं उखड़ रही है ,अंधविश्वास ,आडम्बर और झूठी परम्पराओ का ज्यादा असर हमारे ग्रामीण क्षेत्रों मे दिखाई दे रहा है।धर्म का झूठा चोला पहने कई पांखण्डीयो द्वारा आज भी लोगों को जादू -टोने,भूत-प्रेत, तांत्रिक विद्या से बीमारियों का उपचार ,भभूत स

"आतंक के गढ मे लोकतंत्र का सम्मेलन"।

अगले महीने होने वाले कामॅनवेल्थ संसदीय सम्मेलन की मेजबानी पाकिस्तान कर रहा है, इसके लीये उसने भारत के सभी विधानसभा अध्यक्षों को न्योता दिया लेकिन कश्मीर विधानसभा अध्यक्ष को न्योता न देकर साफ तौर से जाहिर कर दिया कि उसकी नापाक नजर अब भी कश्मीर पर ही टीकी है,लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कडे तौर पर यह कह दिया है की अगर कश्मीर को आमंत्रित न किया गया तो इस सम्मेलन का स्थान किसी अन्य देश मे होना चाहिये जो कि बिल्कुल सही निर्णय है। आतंकवाद क ा गढ कहे जाने वाले पाकिस्तान मे लोकतंत्र का सम्मेलन क्या सुचारू रूप से सफल हो पायेगा? या इस पर भी आतंकी गाज गिरेगी। इस सम्मेलन मे भाग लेने वाले विदेशी मेहमान अभी से चिन्तित नजर आ रहे है ।अब देखना यह है कि क्या पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतो से एक बार फिर अपने आप को आतंकवाद की नर्सरी घोषित करता है या अपना योगदान इसे खत्म करने मे देता है।।। पंकज कसरादे

"आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी''

मन की बात करने वाले माननीय प्रधानमंत्री अभी तक चुप क्यों हैं ? क्यों वो अपने नालायक बेटे की सुध नही ले रहे हैं ? 125 करोड़ की जनसंख्या वाले खुद्दार देश का प्रधानमंत्री आखिर क्यों 35 करोड़ के अमेरिका से कहता रहता है कि इस 20 करोड़ के पाकिस्तान को समझा ले कि वो हमारे यहाँ आतंकवादी न भेजे।क्या हमारे सैनिक कमजोर हैं ? या हमारी सैन्य शक्ति कम हैं ? या यूँ कह ले कि हम पाकिस्तानियो से डरते हैं ? । । जी नहीं दोस्तों ,ऐसा कुछ नहीं है।दरअसल बात ऐसी है कि,हर पिता चाहता है कि उसका बेटा अच्छा सीखे,उसके अंदर कुछ अच्छे संस्कार आये। अगर बेटा कूमार्ग ,कुसंगति कि ओर बढता है तो पिता का कर्तव्य होता हैं कि वह उसका मार्गदर्शन करे,उसे सुधरने का अवसर प्रदान करे।और यही हम कर रहे है,पाकिस्तान रूपी कलयूगी ,नालायक बेटे को लायक बनाने का हम हरसंभव प्रयास कर रहे हैं ,लेकिन वह हैं कि आखिर सुधरने का नाम ही नही ले रहा। हम समझा -समझा कर थक चूके है कि,"खुदा गंजे को नाखून नहीं देता है",लेकिन वह तो जिद पर अडा बैठा है कि पापा मुझे कश्मीर चाहिए ,कश्मीर चाहिए ,अब कश्मीर कोई खिलौना थोड़ी है जो दे देंगे ,भला कोई अप

"आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी''

Chat conversation end

mera bharat mahan

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आरोप और प्रत्यारोप की राजनीति के इस दौर मे यह तय करना मुश्किल हो गया हैं कि आखिर सच क्या हैं और झूठ क्या ?? लोकतंत्र तो सिर्फ एक मजाक बनकर रह गया हैं।इस अंधी राजनीति वाले दौर मे जनता का महत्व तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा,जनता का दायित्व सिर्फ़ वोट देने तक हि सिमट कर रह गया हैं ,इसलिए इसे जनतातंत्र कहने कि बजाय नेतातंत्र कहे तो कुछ बुरा नहीं होगा।।खैर छोडिये स्वतंत्रता दिवस आने वाला हैं,तो शुरू हो जाइए अब कि  ‪#‎ मेरा‬ -भारत  ‪#‎ महान‬ ।।। । ‪#‎ कसरादे‬ -Ji

suno saheb

अपना खून पसीना एक कर मेहनत से एक-एक रुपया कमाते हैं साहेब , उसके बाद आपको कभी यातायात शुल्क तो कभी शिक्षा शुल्क तो कभी जीवन बीमा और पता नहीं कौन -कौन से शुल्क हम गरीब देते हैं ,तो वो टैक्स रूपी आपकी कमाई जो हम आपको अपना पेट चीर कर देते हैं ,वो इसलिए नहीं देते है कि आप लोकतंत्र रूपी मन्दिर मे आधुनिक राजनैतिक पुजारी बन सब कुछ बर्बाद करते रहो !! 80 करोड़ आपके अप्पा की कमाई हुई जागिर नहीं है जो आप उसे पानी की तरह बहा रहे हो साहेब ???  अगर आपका पक्ष-विपक्ष और आरोप -प्रत्यारोप का  खेल खत्म हो गया हो तो कुछ अब हम मासूम जनता के बारे मे भी सोच लीजिए साहेब । . . ‪#‎ kasrade‬ -ji.