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दर्द...

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एक नासूर दर्द...जिसका भला कोई इलाज़ संभव नही है वह जानता है, वह जानता है उस दर्द को जो अकारण ही किसी भी वक्त अचानक से आकर उसकी रूह को कपकपा देता है, एक ऐसी सिहरन पैदा कर देता है सीने में की उस सिहरन को सहन कर पाना उसके लिए असंभव सा होता है लेकिन वह आदि हो चूका है उस दर्द को झेलने का... वह दर्द जो बचपन के बीत जाने के बाद उसे मिला है , वह दर्द जिसने उसे वक्त से पहले ही जवान कर दिया था, वह दर्द जो उन गाँव के भोले भाले मज़दूरों की दुर्दशा देखकर उसके सीने में उमड़ा था ... वह दर्द अब अपनी सीमाएं बढ़ाये जा रहा है, पहले उस दर्द की एक टाइमिंग थी और वो एक टाइम पीरियड में ही उठता था... लेकिन अब जब तब उठने लगा है वह दर्द... लोग जानने लगे है उस दर्द के बारे में , लोगों को शक होने लगा है उस अजीब सी सिहरन का, उस बेचैनी का जिसे उसने वर्षों से अपने सीने में दबा रखा था। आनंद मूवी देखी है.. उसका वो आनंद सहगल याद है... बाबु मोशाय...हम सब इस रंग मंच की कठपुतलियां है,जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है....कौन कब कहाँ कैसे..... बस...कुछ ऐसी ही ज़िन्दगी हो चली है उसकी भी...या कहे की वह उस फिल्म को वास्तवि

बस एक तुम्हारी जीत के ख़ातिर हम अपनों से हार चले हैं...

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वही तुम्हारा रोना धोना वही तुम्हारी नादानी, जज्बातों से खेल खेल में वही तुम्हारी शैतानी, रूठे रूठे बातें करना या पल में गुस्सा हो जाना, कभी देर तलक जागते रहना या फिर जल्दी सो जाना, ‌खुद ही खुद को समझा कर हम खुद ही खुद से दूर चले हैं, ‌बस एक तुम्हारी जीत की खातिर हम अपनों से हार चले है।(1) ‌हर एक तुम्हारी गुस्ताखी को,गुस्ताखी लिखना चाहा था, झूठे सच्चे लम्हों में संग दर्पण में दिखना चाहा था, ख़ामोशी जब जब तोड़ी हमने,हम हुए हमेशा बदनाम सही, तुम सच्ची सच्ची बातों वाली,हम झूठे पैगाम सही, महफिल महफ़िल मुस्काकर लो अपनी वो दुनिया छोड़ चले है, बस एक तुम्हारी जीत के खातिर हम अपनों से हार चले है।(2) भावों से भावों में घुसकर भावों को ही तौल दिया अब, होंठो से एक गरम लगाकर शब्दों को भी खोल दिया अब, आने वाली नश्ले मुझको बेशक ठुकरा जाये तो? गुस्ताखी खुद जो की नही हैं उनका दोष लगाये तो? फिर भी हँसते हँसते हम लो होठों में विष डाल चले हैं, बस एक तुम्हारी जीत की खातिर हम अपनों से हार चले हैं।(3) बस एक तुम्हारी जीत की खातिर हम अपनों से हार चले हैं....

बस जबसे तुम खामोश रहने लगे ...

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तुम बात करने में इतना हिचकिचाती क्यों हों? क्योंकि तुम पत्थर की तरह एकदम ढीठ और खामोश रहते हो। वाकई,सच में, हाँ .. पर तुम्हें ही ऐसा क्यों लगता हैं, और लोग भी तो बात करते है मुझसे उन्हें तो ऐसा कुछ नही लगता। क्यूँ, तुम्हे नही लगता की उन और लोगों में और मुझमे बहुत अंतर हैं। हाँ,लगता तो हैँ, वैसे उन और लोगों में और तुममे क्या अंतर हैं? यही की वो सब दुनिया को देखकर तुमसे बात करने आ जाते है, और मैं तुम्हें देखकर। हाहाहाहा...... तुम इतनी बड़ी बड़ी बातें कब से करने लगी। बस जबसे तुम खामोश रहने लगे।