क्या नोटबंदी से गरीबी में मंदी आयेंगी मोदीजी?


 हाल ही में मोदी सरकार के एक बहुत बड़े फैसले जिसमें 500 और 1000 के नोटों को बंद कर दिया गया, ने पुरे भारत में हड़कम्प मचा के रखा हुआ है. जहाँ सरकार के साथ खड़े लोग इसे एक ऐतिहासिक फैसला बताते हुये इसे कालेधन पर मोदी की सर्जिकल स्ट्राईक बता रहे है वहीं विपक्ष का रवैया इससे बिल्कुल अलग थलग नजर आ रहा है.
नोटबंदी के बाद से सोशल साइट्स, टेलिविजन, अखबार आदि सभी सूचना के माध्यम इससे होने वाले नफे नुकसान पर अपने अपने विचारों को रख रहे है.

देश का उच्चवर्गीय खेमा जिसे इस फैसले से सबसे ज्यादा ठेस पँहुची है(ऐसा सरकार और उनके समर्थकों का मानना हैं) जिनके पास काले धन का अंबार लगा था  वह भी धीमें स्वर में लेकिन बड़ी तत्परता के साथ सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहा है.
लेकिन एक दुसरा निम्नमध्यमवर्गीय खेमा भी हैं जो  अपने दैनिक रोजगार को छोड़ घंटो लाईनों में लगकर भी सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहा है, ये सोचते हुये कि हर बार गरीब ही क्यों सरकार की कठपुतली बनती है हमेशा?
हर बार देश का गरीब तबका ही क्यों दंश झेलता है?
हर बार सरकार के किसी भी फैसले का उपहास का पात्र गरीब ही क्यों बनता है?
सरकार अपने घोषणा पत्र या बयानी भाषणों से एक उम्मीद पैदा करती है एक विश्वास जगाती है और फिर एक ही झटके में उस उम्मीद को तार तार कर देती है....क्यों?
देश का निम्नवर्गीय तबका आज भी कुपोषण, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा और सड़को की बदहाल स्थिति से रोज जद्दोजहद कर रहा है।
हाल ही में इंटरनेशनल फूड पाँलिसी रिसर्च इंस्ट्यूट (IFPRI) द्वारा 11 अक्टूबर 2016 को वैश्विक भुखमरी सूचकांक जारी किया गया जिसमें भारत की स्थिति 97 वे पायदान पर रही, जानकर आश्चर्य होता है कि हमारे सफेदपोश राजनेता अपने भाषणों में हर वक्त कहते रहते है कि हम अशिक्षा से लड़ेगे, हम गरीबी से लड़ेगे, हम भूखमरी से लड़ेगे.......... लेकिन अफसोस कि वह भाषण वह बयान केवल कुछ टीवी के विजुअल्स से लेकर अखबार और अखबार से लेकर पत्रिकाओं को सर्वे में प्राप्त आकड़ों तक ही सिमट कर रह जाते है, और जमीनी हकीकत जस की तस ही बनी रहती है।
अब भी देश का वह 70 फीसदी तबका जो गाँवो में निवास करता है सरकार से यही आस लगा कर बैठा है कि जिस तरह पूंजीपतियों के लिये, रसुखदारों के लिये, औद्धोगिक घरानों में अंबानी और अडानी के लिये अच्छे दिन आते है वैसे ही कभी तो हमारे अच्छे दिन आयेंगे...
कभी तो देश का वह गरीब तबका भी बड़ी शिद्दत के साथ कह पायेंगा कि ये पूंजीपतियों पर सर्जिकल स्ट्राईक हैं, ये गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राईक हैं, ये भूखमरी पर सर्जिकल स्ट्राईक हैं, ये कुपोषण पर सर्जिकल स्ट्राईक हैं....
कभी तो ....

क्या नोटबंदी से गरीबी में मंदी आयेंगी, मोदीजी???

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