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मरने का ख्याल

 आज शाम से बैठा हूँ खेत में अपने  देख रहा हूँ कैसी वीरानी छाई है  जहां तक नज़र जा रही है वहां तक  सिवाय सुर्ख़ मिट्टी के कुछ भी नहीं है जाने क्यूं जीने पर सवाल आया है पहली मर्तबा मरने का ख्याल आया है क्या ताउम्र ज़िंदगी यूँ ही चलेगी या जिस्म की मिट्टी अब पैरहन बदलेंगी? वो फूल जिन्हें इस बारिश में खिलना था  वो इत्र जिसे इन कपड़ों पर महकना था  लेकिन क्यूं हारे हुए मन का मलाल आया है  पहली मर्तबा मरने का ख्याल आया है। अपनी कुटिया अपना दीन अपना ईमान  दिल फरेबी सा हुआ और जहां बेईमान  चल चले उस तीसरे जहां में जहाँ  रुत बदलती नहीं है सदी बदलती नहीं है  अलविदा कहूँ कि वक्त ए क़याम आया है   पहली मर्तबा मरने का ख्याल आया है। 

दो दोस्त बिछड़ने के बाद...

दो दोस्त बिछड़ने के बाद, अक़्सर महसूस करते है तन्हाई में एक दूसरे की कमी, अचानक आमने सामने बैठने पर नज़रे चुरा कर देखते रहते है एकटक एक दूसरे की ओर जब तक कि ना मिले दोनों की नज़रे न...

दर्द...

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एक नासूर दर्द...जिसका भला कोई इलाज़ संभव नही है वह जानता है, वह जानता है उस दर्द को जो अकारण ही किसी भी वक्त अचानक से आकर उसकी रूह को कपकपा देता है, एक ऐसी सिहरन पैदा कर देता है सीने में की उस सिहरन को सहन कर पाना उसके लिए असंभव सा होता है लेकिन वह आदि हो चूका है उस दर्द को झेलने का... वह दर्द जो बचपन के बीत जाने के बाद उसे मिला है , वह दर्द जिसने उसे वक्त से पहले ही जवान कर दिया था, वह दर्द जो उन गाँव के भोले भाले मज़दूरों की दुर्दशा देखकर उसके सीने में उमड़ा था ... वह दर्द अब अपनी सीमाएं बढ़ाये जा रहा है, पहले उस दर्द की एक टाइमिंग थी और वो एक टाइम पीरियड में ही उठता था... लेकिन अब जब तब उठने लगा है वह दर्द... लोग जानने लगे है उस दर्द के बारे में , लोगों को शक होने लगा है उस अजीब सी सिहरन का, उस बेचैनी का जिसे उसने वर्षों से अपने सीने में दबा रखा था। आनंद मूवी देखी है.. उसका वो आनंद सहगल याद है... बाबु मोशाय...हम सब इस रंग मंच की कठपुतलियां है,जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है....कौन कब कहाँ कैसे..... बस...कुछ ऐसी ही ज़िन्दगी हो चली है उसकी भी...या कहे की वह उस फिल्म को वास्तवि...

बस एक तुम्हारी जीत के ख़ातिर हम अपनों से हार चले हैं...

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वही तुम्हारा रोना धोना वही तुम्हारी नादानी, जज्बातों से खेल खेल में वही तुम्हारी शैतानी, रूठे रूठे बातें करना या पल में गुस्सा हो जाना, कभी देर तलक जागते रहना या फिर जल्दी सो जाना, ‌खुद ही खुद को समझा कर हम खुद ही खुद से दूर चले हैं, ‌बस एक तुम्हारी जीत की खातिर हम अपनों से हार चले है।(1) ‌हर एक तुम्हारी गुस्ताखी को,गुस्ताखी लिखना चाहा था, झूठे सच्चे लम्हों में संग दर्पण में दिखना चाहा था, ख़ामोशी जब जब तोड़ी हमने,हम हुए हमेशा बदनाम सही, तुम सच्ची सच्ची बातों वाली,हम झूठे पैगाम सही, महफिल महफ़िल मुस्काकर लो अपनी वो दुनिया छोड़ चले है, बस एक तुम्हारी जीत के खातिर हम अपनों से हार चले है।(2) भावों से भावों में घुसकर भावों को ही तौल दिया अब, होंठो से एक गरम लगाकर शब्दों को भी खोल दिया अब, आने वाली नश्ले मुझको बेशक ठुकरा जाये तो? गुस्ताखी खुद जो की नही हैं उनका दोष लगाये तो? फिर भी हँसते हँसते हम लो होठों में विष डाल चले हैं, बस एक तुम्हारी जीत की खातिर हम अपनों से हार चले हैं।(3) बस एक तुम्हारी जीत की खातिर हम अपनों से हार चले हैं....

बस जबसे तुम खामोश रहने लगे ...

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तुम बात करने में इतना हिचकिचाती क्यों हों? क्योंकि तुम पत्थर की तरह एकदम ढीठ और खामोश रहते हो। वाकई,सच में, हाँ .. पर तुम्हें ही ऐसा क्यों लगता हैं, और लोग भी तो बात करते है मुझसे उन्हें तो ऐसा कुछ नही लगता। क्यूँ, तुम्हे नही लगता की उन और लोगों में और मुझमे बहुत अंतर हैं। हाँ,लगता तो हैँ, वैसे उन और लोगों में और तुममे क्या अंतर हैं? यही की वो सब दुनिया को देखकर तुमसे बात करने आ जाते है, और मैं तुम्हें देखकर। हाहाहाहा...... तुम इतनी बड़ी बड़ी बातें कब से करने लगी। बस जबसे तुम खामोश रहने लगे।

तो, देशभक्ति खुद डूबने डूबाने लगी.

भ्रम की दवायें असर दिखाने लगी, अंधभक्ति , हर घर से आने लगी. अपने अपने राष्ट्रवाद पर हुआ विवाद, तो, देशभक्ति खुद डूबने डूबाने लगी. मैने अपना लहजा, जरा सा गर्म किया, वह तो उठी, और महफिल से जाने लगी. कभी मेरे पास,उसे कह रही थी फरामोश, अब,खुद ही आजमाईश करने कराने लगी.                                

क्या नोटबंदी से गरीबी में मंदी आयेंगी मोदीजी?

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  हाल ही में मोदी सरकार के एक बहुत बड़े फैसले जिसमें 500 और 1000 के नोटों को बंद कर दिया गया, ने पुरे भारत में हड़कम्प मचा के रखा हुआ है. जहाँ सरकार के साथ खड़े लोग इसे एक ऐतिहासिक फैसला बताते हुये इसे कालेधन पर मोदी की सर्जिकल स्ट्राईक बता रहे है वहीं विपक्ष का रवैया इससे बिल्कुल अलग थलग नजर आ रहा है. नोटबंदी के बाद से सोशल साइट्स, टेलिविजन, अखबार आदि सभी सूचना के माध्यम इससे होने वाले नफे नुकसान पर अपने अपने विचारों को रख रहे है. देश का उच्चवर्गीय खेमा जिसे इस फैसले से सबसे ज्यादा ठेस पँहुची है(ऐसा सरकार और उनके समर्थकों का मानना हैं) जिनके पास काले धन का अंबार लगा था  वह भी धीमें स्वर में लेकिन बड़ी तत्परता के साथ सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहा है. लेकिन एक दुसरा निम्नमध्यमवर्गीय खेमा भी हैं जो  अपने दैनिक रोजगार को छोड़ घंटो लाईनों में लगकर भी सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहा है, ये सोचते हुये कि हर बार गरीब ही क्यों सरकार की कठपुतली बनती है हमेशा ? हर बार देश का गरीब तबका ही क्यों दंश झेलता है ? हर बार सरकार के किसी भी फैसले का उपहास का पात्र ...

गज़ल

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सियासत में जरूरी है रवादारी....समझता है??

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गरीबी अशिक्षा भ्रष्टाचार आदि को सिरे से खारिज कर देने के वायदों के साथ लोगों के दिलों में बहुत तेजी से विश्वास घोलने वाली अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी धीरे धीरे अपना अस्तित्व खोते जा रही है,जिस जनलोकपाल और भ्रष्टाचार को हथकण्डा बनाकर लोगों के दिलों में जो विश्वास आम आदमी पार्टी ने कायम किया था,वह महज अब एक ढकोसला साबित होते जा रहा है. जिन लोगों ने जनता को यकीन दिलाया था कि वे एक भ्रष्टाचार मुक्त भारत की नींव स्थापित करेंगे वे लोग खुद उलुल जलुल बयानबाजी या महिला उत्पीड़न के केस में शामिल होकर जनता के अनदेखे विश्वास पर पानी फेरे जा रहे है. अरविंद केजरीवाल का रूख धीरे धीरे धुर विरोधी बनता जा रहा है,हर मसले पर अब केजरीवाल केन्द्र को निशाना बना रहे है,केन्द्र के हर अच्छे काम पर भी केजरीवाल की बयानबाजी उनके व्यक्तित्व को परिभाषित कर रही है. अपने डेढ़ साल के कार्यकाल में ही आम आदमी पार्टी अपनी इतनी भद्द पिटवा चुकी है जितनी तो विपक्ष की अन्य पार्टियों ने भी नही पिटवाई थी. डेढ़ साल में ही पार्टी के आधे मंत्री हटाने पड़े,करीब दो दर्जन विधायक आपराधिक मामलों में पूलिस के घेरे मे...

गुल्लक और उसके पांच सिक्के

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कुछ ही महीनो पहले की बात है एक नई नई सी गुल्लक कमरे में दाखिल हुई थी, या यह कहे की कोई ईश्वर का फरिश्ता उस गुल्लक को उस एक कमरे में छोड़कर चला गया था.अब गुल्लक कमरे में आयी तो  धीरे धीरे उसमें सिक्के भी आना शुरू हुआ। पहला सिक्का मैं स्वयं था, जो उस गुल्लक में प्रवेश हुआ था, मेरी हैसियत केवल एक मेलोडी खरीदने लायक थी ,क्योंकि मैं था ही एक रुपये का सिक्का ! वह जो गुल्लक थी अंदर से आम गुल्लकों की तुलना में काफी गहरी थी,उसमे मेरे जैसे तकरीबन 500-1000 सिक्के आ सकते थे, वह अलग बात थी की गुल्लक का प्रेम शायद कुछ ही सिक्कों से था या यह कहे की गुल्लक अपने अंदर केवल पाँच सिक्कों को ही रखना चाहती थी , और वह भी एक एक रुपये के पाँच सिक्के। जो अन्य 4 सिक्के थे वह भी मेरी तरह ही एक रुपये वाली या शायद एक रूपये से ज्यादा की हैसियत रखते थे। अब जैसे ही गुल्लक में पाँचों सिक्के एक साथ हुए उनमे आपस में लगाव बढ़ने लगा यह देखकर गुल्लक बहुत खुश हुई, गुल्लक को लगा मेरे अंदर रहने वाले ये सिक्के बहुत खुश है और उन सिक्को की ख़ुशी देखकर गुल्लक मन ही मन खुश होती रही। कुछ ही समय में सिक्के और गुल्लक में इतनी ज...

भोपाल से बुदनी घाट

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अचानक सेन्ट्रल लाइब्रेरी से GST पर व्याख्यान सुनने के बाद हमारा प्लान बना कि आज रात भर कहीं घुमा जाये,तो तय हुआ कि बुदनी घाट चलकर नर्मदा नदी को निहारा जाये. हम लोग तकरीबन रात को 9 बजे भोपाल से होशंगाबाद के लिये रवाना हुये, रास्ते में चलते चलते पिछले कुछ दिनों का मानसिक दबाव हल्का लो चला था, हम लोग आजाद महसूस कर रहे थे,गाड़ी को सामान्य रफ्तार में चलाते हुये हम लोग कुमार विश्वास के मुक्तक और जान एलिया,इब्ने इंशा,नूसरत साहब के शेर एक दुसरे को सुनाते जा रहे थे, जब जान एलिया का यह शेर पढ़ा कि- “ कितने ऐश उड़ाते होंगे, कितने इतराते होंगे. जाने कैसे लोग वो होंगे जो उसको भाँते होंगे. कुछ तो जिक्र करो तुम यारों उसकी कयामत बाहों का, वो जो उनमे सिमटते होंगे वो तो मर जाते होंगे... ” तो एक अजीब सी मुस्कुराहट चेहरे पर ऊभर आयी. धीरे धीरे हमारी गाड़ी मण्डीदीप पहुँची जहाँ ठहर कर हमने चाय पी और उस चाय वाले के दर्द को महसूस किया,बंदा तीन बार से एक ही एक गाना बजाये जा रहा था कि - दोस्ती इम्तेहान लेती है.., चाय पीते पीते कुछ समय के लिये लगा कि कहीं यह चाय वाला हमारे ऊपर तो कटाक्ष नही कर र...

नई कविता या नहीं कविता

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स्वतंत्रता के बाद से हिन्दी साहित्य में जो नई कविता का युग प्रारंभ हुआ , कहा गया कि प्रयोगवाद के बाद जो कविता की नवीन धारा विकसित हुई वह नई कविता हैं। इस नई कविता के युग में रची जाने वाली रचनाधर्मिताओं का आधार बिम्ब , समाज , संस्कृति , देशप्रेम , सौन्दर्य बोध , प्रकृति आदि हैं ऐसा माना जाता आ रहा हैं कि इस युग के रचनाकारों ने परम्पराओं को दरकिनार कर प्रगतिशील रचना की पैठ स्थापित की थी। अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित -"द्वितीय तारसप्तक" हो या फिर इलाहाबाद की साहित्यिक संस्था ' परिमल ' के द्वारा प्रकाशित "नई कविता" पत्रिका हो , जिनसे ही इस युग की नींव स्थापित हुई थी। धीरे धीरे इस नई कविता के युग में परिवर्तन ही परिवर्तन नज़र आये , जो रचनाधर्मिता इस युग के प्रारंभ में देखने को मिली आगे चलकर वह और प्रभावी बनती गई लेकिन अब इतना आगे निकल आयी की उसका प्रभाव समाप्त हो गया। अज्ञेय , मुक्तिबोध , भवानीप्रसाद मिश्र आदि के बाद दुष्यंत कुमार के बाद जयकुमार जलज , श्रीराम परिहार आदि ने इस युग को बढ़ाने में बखुबी योगदान दिया। लेकिन ये कविताएँ केवल बौद्धिक लो...

यूँ ही फिक्र सी लगी हैं..

यूँ ही फिक्र सी लगी हैं.... जिक्र भी नहीं हैं अब.. किस्सा ए कहानी में कहीं, न तो नज़र आती हैं वो नज्म या तराने में कहीं .... फिर भी फिक्र सी लगी है... जिक्र भी नहीं हैं कहीं ... उन कल्पनाओं का जो कभी हिल्लोरे खाकर दिल में उठा करती थी। गाँव की उस पगडंडी पर चलते चलते। जो मुझे नदियों और खेतों की ओर ले कर जाती थी। खैर!!! वह स्वर्ग ही नही है अब ,तो जिक्र भी नहीं हैं अब.... फिर भी, फिक्र सी लगी हैं.... @☆ ‪#‎ बेख़बर‬ ...

जरा गौर से सुनो!!!

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सुनो! आहट तो सुनो जरा, कोई दस्तक दे रहा है मेरे!!! मेरे इस सुने घर में कोई खलल डाल रहा है मेरी आंतरिकता मे स्थित मेरे मस्तिष्क की गहराईयों में ! ! ! जरा गौर से सुनो!!! किसी की दबिश सुनाई दे रही हैं तुम्हें ! अपने हृदय के नयन पटलो को खोलो और अपने चक्षु को केन्द्रित करो तुम देखोगी किसी की दस्तक को महसुस करोगें उस आहट को जो जो मुझे तुमसे दुर किये जाने के लिये आयी थी।