अचानक सेन्ट्रल लाइब्रेरी से GST पर व्याख्यान सुनने के बाद हमारा प्लान बना कि आज रात भर कहीं घुमा जाये,तो तय हुआ कि बुदनी घाट चलकर नर्मदा नदी को निहारा जाये. हम लोग तकरीबन रात को 9 बजे भोपाल से होशंगाबाद के लिये रवाना हुये, रास्ते में चलते चलते पिछले कुछ दिनों का मानसिक दबाव हल्का लो चला था, हम लोग आजाद महसूस कर रहे थे,गाड़ी को सामान्य रफ्तार में चलाते हुये हम लोग कुमार विश्वास के मुक्तक और जान एलिया,इब्ने इंशा,नूसरत साहब के शेर एक दुसरे को सुनाते जा रहे थे, जब जान एलिया का यह शेर पढ़ा कि- “ कितने ऐश उड़ाते होंगे, कितने इतराते होंगे. जाने कैसे लोग वो होंगे जो उसको भाँते होंगे. कुछ तो जिक्र करो तुम यारों उसकी कयामत बाहों का, वो जो उनमे सिमटते होंगे वो तो मर जाते होंगे... ” तो एक अजीब सी मुस्कुराहट चेहरे पर ऊभर आयी. धीरे धीरे हमारी गाड़ी मण्डीदीप पहुँची जहाँ ठहर कर हमने चाय पी और उस चाय वाले के दर्द को महसूस किया,बंदा तीन बार से एक ही एक गाना बजाये जा रहा था कि - दोस्ती इम्तेहान लेती है.., चाय पीते पीते कुछ समय के लिये लगा कि कहीं यह चाय वाला हमारे ऊपर तो कटाक्ष नही कर र...
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