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गुल्लक और उसके पांच सिक्के

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कुछ ही महीनो पहले की बात है एक नई नई सी गुल्लक कमरे में दाखिल हुई थी, या यह कहे की कोई ईश्वर का फरिश्ता उस गुल्लक को उस एक कमरे में छोड़कर चला गया था.अब गुल्लक कमरे में आयी तो  धीरे धीरे उसमें सिक्के भी आना शुरू हुआ। पहला सिक्का मैं स्वयं था, जो उस गुल्लक में प्रवेश हुआ था, मेरी हैसियत केवल एक मेलोडी खरीदने लायक थी ,क्योंकि मैं था ही एक रुपये का सिक्का ! वह जो गुल्लक थी अंदर से आम गुल्लकों की तुलना में काफी गहरी थी,उसमे मेरे जैसे तकरीबन 500-1000 सिक्के आ सकते थे, वह अलग बात थी की गुल्लक का प्रेम शायद कुछ ही सिक्कों से था या यह कहे की गुल्लक अपने अंदर केवल पाँच सिक्कों को ही रखना चाहती थी , और वह भी एक एक रुपये के पाँच सिक्के। जो अन्य 4 सिक्के थे वह भी मेरी तरह ही एक रुपये वाली या शायद एक रूपये से ज्यादा की हैसियत रखते थे। अब जैसे ही गुल्लक में पाँचों सिक्के एक साथ हुए उनमे आपस में लगाव बढ़ने लगा यह देखकर गुल्लक बहुत खुश हुई, गुल्लक को लगा मेरे अंदर रहने वाले ये सिक्के बहुत खुश है और उन सिक्को की ख़ुशी देखकर गुल्लक मन ही मन खुश होती रही। कुछ ही समय में सिक्के और गुल्लक में इतनी ज...

भोपाल से बुदनी घाट

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अचानक सेन्ट्रल लाइब्रेरी से GST पर व्याख्यान सुनने के बाद हमारा प्लान बना कि आज रात भर कहीं घुमा जाये,तो तय हुआ कि बुदनी घाट चलकर नर्मदा नदी को निहारा जाये. हम लोग तकरीबन रात को 9 बजे भोपाल से होशंगाबाद के लिये रवाना हुये, रास्ते में चलते चलते पिछले कुछ दिनों का मानसिक दबाव हल्का लो चला था, हम लोग आजाद महसूस कर रहे थे,गाड़ी को सामान्य रफ्तार में चलाते हुये हम लोग कुमार विश्वास के मुक्तक और जान एलिया,इब्ने इंशा,नूसरत साहब के शेर एक दुसरे को सुनाते जा रहे थे, जब जान एलिया का यह शेर पढ़ा कि- “ कितने ऐश उड़ाते होंगे, कितने इतराते होंगे. जाने कैसे लोग वो होंगे जो उसको भाँते होंगे. कुछ तो जिक्र करो तुम यारों उसकी कयामत बाहों का, वो जो उनमे सिमटते होंगे वो तो मर जाते होंगे... ” तो एक अजीब सी मुस्कुराहट चेहरे पर ऊभर आयी. धीरे धीरे हमारी गाड़ी मण्डीदीप पहुँची जहाँ ठहर कर हमने चाय पी और उस चाय वाले के दर्द को महसूस किया,बंदा तीन बार से एक ही एक गाना बजाये जा रहा था कि - दोस्ती इम्तेहान लेती है.., चाय पीते पीते कुछ समय के लिये लगा कि कहीं यह चाय वाला हमारे ऊपर तो कटाक्ष नही कर र...

नई कविता या नहीं कविता

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स्वतंत्रता के बाद से हिन्दी साहित्य में जो नई कविता का युग प्रारंभ हुआ , कहा गया कि प्रयोगवाद के बाद जो कविता की नवीन धारा विकसित हुई वह नई कविता हैं। इस नई कविता के युग में रची जाने वाली रचनाधर्मिताओं का आधार बिम्ब , समाज , संस्कृति , देशप्रेम , सौन्दर्य बोध , प्रकृति आदि हैं ऐसा माना जाता आ रहा हैं कि इस युग के रचनाकारों ने परम्पराओं को दरकिनार कर प्रगतिशील रचना की पैठ स्थापित की थी। अज्ञेय के संपादन में प्रकाशित -"द्वितीय तारसप्तक" हो या फिर इलाहाबाद की साहित्यिक संस्था ' परिमल ' के द्वारा प्रकाशित "नई कविता" पत्रिका हो , जिनसे ही इस युग की नींव स्थापित हुई थी। धीरे धीरे इस नई कविता के युग में परिवर्तन ही परिवर्तन नज़र आये , जो रचनाधर्मिता इस युग के प्रारंभ में देखने को मिली आगे चलकर वह और प्रभावी बनती गई लेकिन अब इतना आगे निकल आयी की उसका प्रभाव समाप्त हो गया। अज्ञेय , मुक्तिबोध , भवानीप्रसाद मिश्र आदि के बाद दुष्यंत कुमार के बाद जयकुमार जलज , श्रीराम परिहार आदि ने इस युग को बढ़ाने में बखुबी योगदान दिया। लेकिन ये कविताएँ केवल बौद्धिक लो...

यूँ ही फिक्र सी लगी हैं..

यूँ ही फिक्र सी लगी हैं.... जिक्र भी नहीं हैं अब.. किस्सा ए कहानी में कहीं, न तो नज़र आती हैं वो नज्म या तराने में कहीं .... फिर भी फिक्र सी लगी है... जिक्र भी नहीं हैं कहीं ... उन कल्पनाओं का जो कभी हिल्लोरे खाकर दिल में उठा करती थी। गाँव की उस पगडंडी पर चलते चलते। जो मुझे नदियों और खेतों की ओर ले कर जाती थी। खैर!!! वह स्वर्ग ही नही है अब ,तो जिक्र भी नहीं हैं अब.... फिर भी, फिक्र सी लगी हैं.... @☆ ‪#‎ बेख़बर‬ ...

जरा गौर से सुनो!!!

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सुनो! आहट तो सुनो जरा, कोई दस्तक दे रहा है मेरे!!! मेरे इस सुने घर में कोई खलल डाल रहा है मेरी आंतरिकता मे स्थित मेरे मस्तिष्क की गहराईयों में ! ! ! जरा गौर से सुनो!!! किसी की दबिश सुनाई दे रही हैं तुम्हें ! अपने हृदय के नयन पटलो को खोलो और अपने चक्षु को केन्द्रित करो तुम देखोगी किसी की दस्तक को महसुस करोगें उस आहट को जो जो मुझे तुमसे दुर किये जाने के लिये आयी थी।

"कभी गाड़ी नाव पर तो कभी गाड़ी पर नाव"

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क्यों रें अज्जू--- क्या हो रहा हैं आजकल, सुना हैं सरकार आकडो से देश की प्रगति के अंदेशे का झूठा जामा पहना रही हैं। कह रही हैं कि हम प्रगति के अविरल पथ पर लगातार चलायमान हो रहै हैं । क्या सत्यता हैं भई इसमें जरा बताओ तो?? अज्जू- हाँ भाई सुनने मे तो अभी यही आ रहा हैं कि हमारी ग्रोथ बढ़ रही हैं,बड़े बड़े अखबार और पत्रिकाओं मे तो यही छप रहा हैं कि हम उत्थान के पथ पर है। आकडो से भविष्य की नीव रखी जा रही है भाई वर्तमान के परिदृश्य को सापेक्ष रखकर। वर्तमान के परिदृश्य को सापेक्ष रखकर?? तनिक विस्तार से बताओ भाया कैसे ? अज्जू- देख भाई ऊ का हैं न कि आजकल हमारे देश मे आकडो और तथ्यों को ज्यादा महत्व दिया जा रहा बजाय शुरूआती विकास और ग्रामीण क्षेत्रों मे हो रहै निवेश को छोडकर। ग्रामीण क्षेत्रों मे निवेश ??? यह क्या बोल रहै हो भाई कोन सा निवेश हुआ है ग्रामीण क्षेत्र मे ?? अज्जू-- अरे!ऐसा हमारी सरकार कह रही हैं भ्राता, आजकल क्या अखबार वखबार पढ़ना छोड़ दिये हो का तुम जो ऐसे चकराय रहै हो ग्रामीण क्षेत्रों मे निवेश की बात सुनकर? अरे हाँ ऊ बहुत दिन हो गया हैं न परीक्षा के चलते अखबार पर नजर ही नहीं डा...

संवाद: साहित्य- कहानी -: भ्रम में दोस्ती

संवाद: साहित्य- कहानी -: भ्रम में दोस्ती : यूँ ही काँलेज दिनों की बात हैं, नया नया काँलेज शुरू हुआ था, देश के बहुत से राज्यों से विद्दार्थी विद्दाध्ययन के लिये आये हुए थे। विशाल भी उ...