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कवायद

आज कल लोग कुछ लगाये न लगाये कवायद लगाना कभी नही भुलते। आप एक समय के लिये अगर अपने नाम पर लगने वाली मात्रा न लगाओ तो चल जायेगा लेकिन अगर आपने कवायद नही लगाई तो फिर आपका जीना व्यर्थ है समझो। अब कवायद भी कौन लगाता है देखिए- सबसे पहले कवायद शब्द का उपयोग करती है हमारी मीडिया, अब कभी किसी पाकिस्तानी क्रिकेटर की भारतीय क्रिकेटर से बात हो गई अपने खेल को ही लेकर तो हमारी मीडिया का रूख रहेगा कि-"आज फलाँ क्रिकेटर पाकिस्तान के फलाँ क्रिकेटर से मिला दोनो मे घन्टो गुफ्तगु होती रही भले ही दोनो ने 5 मिनट बमुश्किल से बात की होगी लेकिन मीडिया बतायेगी तो ऐसे जैसे कि सीमा पर युद्ध की साजिशे रची जा रही है।" अब एक नजर डालते है राजनीति के क्षेत्र मे कवायद कैसे लगती हैं । हाल कि बात करे अभी तो "कुमार विश्वास की बर्थ डे पार्टी चल रही थी उसमे बीजेपी के दिग्गज नेता मौजूद, कुमार विश्वास के बीजेपी मे शामिल होने की कवायद बड़ी" अब इसमे नयी बात कौन सी है भैया अब पार्टी मे शामिल दोस्त भी तो हो सकते है जरूरी तो नही की सारे बीजेपी के ही हो अन्य पार्टियों के भी लोग आते है उन पर फोकस कीजिए ...

यूँ खुद को ना उदास करों

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सारी कोशिशें जब दर दीवार होने लगे बेवजह जब कोई दरकिनार होने लगे फलसफाँ रहगुजर का नया आयाम तलाश करों..... घुट घुट कर जी कर ना खुद को उदास करों.... उम्मीदें सारी जब गम ए रूखसत सी होने लगे उन्मादमयी सपने सारे यातनाओं मे सोने लगे करवटे बदल कर नया रास्ता इजाद करो.. अतीत से मुखातिब हो यूँ खुद को ना निराश करों.......... झूठी तोहमत जब दिल के साथ होने लगे हाल ए जज्बात जब साथ साथ रोने लगे उठ कर सुदूर सा कोई मन्सूबा नायाब करो.... यादों की गठरी खोल यूँ खुद को ना नासाज करों..... "बेखबर"

#mcuworkshop

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लेखन कला विविध आयाम:लेखन के संदर्भ में जनसंचार विभाग का विशेष एवं बौद्धिक आयोजन,जिसमें हम रूबरू होंगे कुछ महान रंगकर्मी एवं शिक्षविदों से जिन्होंने लेखन के क्षेत्र में एक नई मिशाल कायम कर लेखन से सबको प्रभावित किया हैं। इस कार्यशाला में हम मीडिया लेखन,समाचार लेखन आदि के बारे में विस्तृत तरीके से अध्ययन करेंगे एवं लेखन के बारे में सीखेंगे। तो सभी जनसंचार के विद्यार्थियो को इंतज़ार है 15 जनवरी से शूरू हो रही एक विशेष एवं उपयोगी कार्यशाला का जो 15 जनवरी से 17 जनवरी तक जारी रहेंगी

मेरी ख़ामोशी को तुम कुछ नाम ना दो।

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मेरी खामोशी को तुम कुछ नाम ना दो। अकेला हूँ अंदर से मुझे मकान ना दो। मेरें जिस्म की कलिश को काली रहने दो। सफेद रंग मे रंगने का मुझे आयाम ना दो।   गरीबी,लाचारी,मजबूरी,मेरे बचपन के साथी हैं । चंद सुनहरे पल बिताकर मुझे ख्वाबो सा अंजाम ना दो। माटी की फूटी कुटिया में मौजू किया हैं इंसाँ के साथ। इस जर्जर शहर मे लाकर तुम मुझे हैवान ना दो। माँ बाप और बहनों से स्वर्ग है मेरा शजर। अनदेखे लोगों के बीच मुझे शमशान ना दो। बेख़बर................

मै कौन हूँ ?

                                                                            मै कौन हूँ ??? बचपन की आनाकानी में, या हो बेबस जवानी में। लुटती हर वक्त है वो, कश्मीर चाहे कन्याकुमारी में। यूँ तो वह माँ होती हैं, या होती है बहन किसी की, निकलती है जब दुनिया देखने, बन जाती हैं हवस किसी की। पुरुष प्रधान इस देश की, बस इतनी यहीं कहानी हैं, लालन के लिये माँ  राखी के लिये बहन हमसफर के लिये पत्नी लेकिन बेटी के लिये मनाही हैं । लज्जित होना उत्पीडित होना हर दिन की उसकी दिनचर्या है, आवाज उठाओ तो बोलते हैं , तमीज से बात कर,तु मेरी भार्या है। भ्रूण हत्या से शुरूआत होती है अगर बच गयी तो जवानी मे दरिन्दो से रात चार होती है। जवानी की दहलीज पर भी बच गई तो ससुराल मे दहेज के लिये बवाल होता है और अगर वहाँ भी बवाल न हुआ तो बुढ़ापे मे अपने ही बच्चो से फिर सवाल होता है , कि सच मे मै एक महिला हूँ ।

यह पाश की कविता हैं

सपने   हर किसी को नहीं आते बेजान बारूद के कणों में सोई आग के सपने नहीं आते बदी के लिए उठी हुई हथेली को पसीने नहीं आते शेल्फ़ों में पड़े इतिहास के ग्रंथो को सपने नहीं आते सपनों के लिए लाज़मी है झेलनेवाले दिलों का होना नींद की नज़र होनी लाज़मी है सपने इसलिए हर किसी को नहीं आते

अंधेरे से उजाले की ओर

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नही जानता हूँ मै कि यह क्या है और क्यूँ हो रहा हैं? अक्सर दुरिया बनानी चाही है उससे लेकिन किसी लोहे की भाँति मै हमेशा उस चुम्बक की ओर आकर्षित हो जाता हूँ ।जानता हूँ यह छलावा है एक शीश महल जैसा जिसमे हर ओर शीशे लगे है,जिधर भी निगाह फेरो वही नजर आता है लेकिन ऐसा क्यूँ हो रहा है?क्या रिश्ता है उससे?कौन है वह जो मेरे अंतर्मन मे लगातार प्रहार किये जा है? कभी-कभी खुद से जानने की कोशिश मे राते बीत जाती है लेकिन क्यूँ नही ढूँढ पा रहा हूँ मै उस वजह को जो बार बार मेरे मानसपटल पर प्रहार किये जा रही हैं। एक बार हो तो सहसा संभल भी जाऊँ लेकिन यह तो दैनिकता मे विद्दमान हो चुकी है कैसे इससे निजात पाऊँ? सोचता हूँ कोई न कोई वजह जरूर होंगी लेकिन वह भी नजर नही आ रही कहीं गुम हो चुकी है शायद वह वजह भी या फिर कहीं धूमिल पडी है लेकिन मै उसे खोजने मे असमर्थ हो रहा हूँ । आदत सी बन चुकी है किसी सिगरेट की तरह ,हरदम होठो से ही लगाये रखना चाहता हूँ ?लेकिन क्यूँ ? क्यूँ मै उसका इतना आदी बना जा रहाँ हूँ ,जानता हूँ कि अगर आग मे हाथ डालूँगा तो हाथ मेरा ही जलना हैं। हरदम रेल की लाइनों की यादे जेहन में स्फ...